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जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाई जा रही Birsa Munda की जयंती, जानें- कौन थे बिरसा मुंडा 

Jharkhand Birsa Mundas Birth Anniversary: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने बिरसा मुंडा (Birsa Munda) की जयंती के मौके पर आज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए रांची (Ranchi) में भगवान बिरसा मुंडा स्मृति उद्यान सह स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय का उद्घाटन किया. अपने संबोधन में पीएम मोदी ने कहा, आजादी के इस अमृतकाल में देश ने तय किया है कि भारत की जनजातीय परंपराओं को, शौर्य गाथाओं को देश अब और भी भव्य पहचान देगा. इसी क्रम में ऐतिहासिक फैसला लिया गया है कि आज से हर साल देश 15 नवंबर यानी भगवान बिरसा मुंडा के जन्म दिवस को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाएगा…तो चलिए आपको बताते हैं कि बिरसा मुंडा कौन थे. 

15 नवंबर 1875 को हुआ था जन्म 
झारखंड की राजधानी रांची से 66 किलोमीटर दूर खूंटी जिले में जंगलों-पहाड़ियों से घिरा एक गांव है- उलिहातू. 15 नवंबर 1875 को इसी गांव में जन्मे बिरसा मुंडा ने ऐसी क्रांति का बिगुल फूंका था, जिसमें झारखंड के एक बड़े इलाके ने अंग्रेजी राज के खात्मे और ‘अबुआ राइज’ यानी अपना शासन का एलान कर दिया था. इन्हीं बिरसा मुंडा की जयंती पर इस 15 नवंबर को पहली बार पूरा देश जनजातीय गौरव दिवस मना रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में पिछले दिनों हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में लिए गए निर्णय के बाद इसकी घोषणा की गई थी. 

लोग भगवान बिरसा मुंडा के रूप में जानते हैं
बिरसा मुंडा ने जिस क्रांति का एलान किया था, उसे झारखंड की आदिवासी भाषाओं में ‘उलगुलान’ के नाम से जाना जाता है. 1899 में उलगुलान के दौरान उनके साथ हजारों लोगों ने अपनी भाषा में एक स्वर में कहा था-‘दिकू राईज टुन्टू जना-अबु आराईज एटेजना.’ इसका अर्थ है, दिकू राज यानी बाहरीराज खत्म हो गया, और हम लोगों का अपना राज शुरू हो गया. बिरसा मुंडा ऐसे अप्रतिम योद्धा थे, जिन्हें लोग भगवान बिरसा मुंडा के रूप में जानते हैं. बहुत कम लोगों को पता है कि बिरसा मुंडा के उलगुलान से घबरायी ब्रिटिश हुकूमत ने खूंटी जिले की डोंबारी बुरू पहाड़ी पर जालियांवाला बाग जैसा बड़ा नरसंहार किया था.

आदिवासी समाज को जागरूक किया 
बिरसा मुंडा जब स्कूल के छात्र थे, तभी उन्हें यह बात समझ आ गई थी कि ब्रिटिश शासन के चलते आदिवासियों की परंपरागत व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो रही है. उन्होंने विरोध की आवाज बुलंद की तो 1890 में उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया. इसके बाद उन्होंने गांव-गांव घूमकर आदिवासी समाज को अपने अधिकारों के लिए जागरूक करना शुरू किया. आदिवासी सरदार उनके नेतृत्व में एकजुट हुए तो अंग्रेजों की पुलिस ने वर्ष 24 अगस्त 1895 को चलकद गांव से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. इतिहास के दस्तावेजों के अनुसार 19 नवंबर 1895 को भारतीय दंड विधान की धारा 505 के तहत उन्हें 2 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई.

अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हुए एकजुट
30 नवंबर 1897 को जब वो जेल से बाहर आए तो खूंटी और आस-पास के इलाकों में एक बार फिर मुंडा आदिवासी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एकजुट हो गए. बिरसा मुंडा ने 24 दिसंबर, 1899 को ‘उलगुलान’ का एलान कर दिया. घोषणा कर दी गई कि जल, जंगल, जमीन पर हमारा हक है, क्योंकि ये हमारा राज है. जनवरी 1900 तक पूरे मुंडा अंचल में उलगुलान की चिंगारी फैल गई. 9 जनवरी, 1900 को हजारों मुंडा तीर-धनुष और परंपरागत हथियारों के साथ डोम्बारी बुरू पहाड़ी पर इकट्ठा हुए. इधर गुप्तचरों ने अंग्रेजी पुलिस तक मुंडाओं के इकट्ठा होने की खबर पहले ही पहुंचा दी थी.

अंग्रेजों के हाथ नहीं आए बिरसा मुंडा 
अंग्रेजों की पुलिस और सेना ने पहाड़ी को चारों ओर से घेर लिया. दोनों पक्षों में भयंकर युद्ध हुआ. हजारों की संख्या में आदिवासी बिरसा के नेतृत्व में लड़े. अंग्रेज बंदूकें और तोप चला रहे थे और बिरसा मुंडा और उनके समर्थक तीर बरसा रहे थे. डोंबारी बुरू के इस युद्ध में हजारों आदिवासी बेरहमी से मार दिए गए. स्टेट्समैन के 25 जनवरी, 1900 के अंक में छपी खबर के मुताबिक इस लड़ाई में 400 लोग मारे गए थे. कहते हैं कि इस नरसंहार से डोंबारी पहाड़ी खून से रंग गई थी. लाशें बिछ गई थी और शहीदों के खून से डोंबारी पहाड़ी के पास स्थित तजना नदी का पानी लाल हो गया था. इस युद्ध में अंग्रेज जीत तो गए, लेकिन विद्रोही बिरसा मुंडा उनके हाथ नहीं आए. 

गिरफ्तार कर लिए गए बिरसा मुंडा 
इसके बाद 3 फरवरी 1900 को रात्रि में चाईबासा के घने जंगलों से बिरसा मुंडा को पुलिस ने उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वो गहरी नींद में थे. उन्हें खूंटी के रास्ते रांची ले आया गया. उनके खिलाफ गोपनीय ढंग से मुकदमे की कार्रवाई की गई. मजिस्ट्रेट डब्ल्यू एस कुटुस की अदालत में उनपर मुकदमा चला. कहने को बैरिस्टर जैकन ने बिरसा मुंडा की वकालत की, लेकिन ये दिखावा था. उन्हें रांची जेल में बंद कर भयंकर यातनाएं दी गईं. एक जून को अंग्रेजों ने उन्हें हैजा होने की खबर फैलाई और 9 जून की सुबह जेल में ही उन्होंने आखिरी सांस ली. उनकी लाश रांची के मौजूदा डिस्टिलरी पुल के पास फेंक दी गई थी. इसी जगह पर अब उनकी समाधि बनाई गई है. बिरसा मुंडा ने जिस रांची जेल में प्राण त्यागे, उसे अब बिरसा मुंडा स्मृति संग्रहालय के रूप में विकसित किया गया है. 

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