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दयानंद सरस्वती की पुण्यतिथि पर देशभर के नेताओं ने दी श्रद्धांजलि, जानिए किसने क्या कहा?

नई दिल्ली: आर्य समाज के संस्थापक और भारत के महान चिंतक स्वामी दयानंद सरस्वती की आज पुण्यतिथि है.देश भर के तमाम केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्रियों ने दयानंद सरस्वती की पुण्यतिथि के मौके पर उन्हें याद किया और श्रद्धांजलि दी.  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कू एप लिखा, ”महान सनातन संस्कृति की पावन संत परंपरा के अतुल्य प्रतिनिधि, आर्य समाज के संस्थापक, अद्भुत सामाजिक व आध्यात्मिक चिंतक, प्रतिबद्ध समाज सुधारक महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि. प्रगतिशील एवं समतामूलक समाज के निर्माण में आपका योगदान अविस्मरणीय है.”

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा, ”आर्य समाज के प्रवर्तक व प्रखर सुधारवादी संत स्वामी दयानंद सरस्वती जी की पुण्यतिथि पर उनके चरणों में कोटि-कोटि नमन.  आप सती प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों का विरोध करने वाले संन्यासी योद्धा थे. आपके द्वारा प्रज्ज्वलित बुद्धिवाद की ज्योति सदैव मानवजाति का मार्ग प्रशस्त करती रहेगी.”

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कू एप पर लिखा, ”आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती जी को पुण्यतिथि पर विनम्र अभिवादन.”

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने लिखा, ”समाज में व्याप्त कुरीतियों और अंधविश्वासों का विरोध करते हुए लोगों को सत्य और सेवा पर आधारित जीवन जीने के राह दिखाने वाले आर्य समाज के संस्थापक व महान समाज सुधारक स्वामी दयानंद सरस्वती जी की पुण्यतिथि पर सादर नमन.”

स्वामी दयानंद सरस्वती के बारे में जानिए…
स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा में हुआ था. उनके पिता का नाम करशनजी लालजी तिवारी और माता का नाम यशोदाबाई था. स्वामी दयानंद सरस्वती ब्राह्मण परिवार से थे. ब्राह्मण परिवार से होने के कारण वह अक्सर पूजा-पाठ अपने घर में देखते रहते थे. लेकिन एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसके कारण उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया. दरअसल बचपन में शिवरात्रि के दिन स्वामी दयानंद का पूरा परिवार रात्रि जागरण के लिए एक मंदिर में रुका हुआ था और उस दिन उनका पूरा परिवार सो गया तब भी वो जाग रहे थे. उन्हें इंतजार था कि भगवान शिव को जो प्रसाद चढाए गए हैं वह उन्हें स्वयं ग्रहण करेंगे.

कुछ देर बाद उन्होंने देखा कि चूहे शिवजी के लिए रखे प्रसाद को खा रहे हैं. यह देख कर वे बहुत आश्चर्यचकित हुए और सोचने लगे कि जो ईश्वर स्वयं को चढ़ाये गये प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वह मानवता की रक्षा क्या करेगा? इस बात पर उन्होंने अपने पिता से बहस की और तर्क दिया कि हमें ऐसे ‘असहाय ईश्वर’ की उपासना नहीं करनी चाहिए.

ऐसा बिलकुल भी नहीं कि उन्होंने केवल अपने धर्म की चीजों पर सवाल उठाए बल्कि उन्होंने ईसाई और इस्लाम धर्म में फैली बुराइयों का कड़े शब्दों में खण्डन किया. उन्होंने अपने महाग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में सभी मतों में व्याप्त बुराइयों का खण्डन किया है. उन्होंने वेदों का प्रचार करने और उनकी महत्ता लोगों को समझाने के लिए देश भर में भ्रमण किया.

महर्षि दयानंद ने तत्कालीन समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों और अन्धविश्वासों की खूब आलोचना की और निर्भय होकर उनको दूर करने का प्रयास किया. उन्होंने जन्म से मिलने वाली जाति का विरोध किया और कर्म के आधार पर वर्ण-निर्धारण की बात कही. दयानंद दलितोद्धार के पक्षधर थे. उन्होंने स्त्रियों की शिक्षा के लिए प्रबल आंदोलन चलाया था. उन्होंने 10 अप्रैल सन् 1875 ई. को मुम्बई के गिरगांव में आर्य समाज की स्थापना की थी. अपने इन्ही कामों की वजह से लोग उन्हें ‘संन्यासी योद्धा’ कहते हैं.

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