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भाजपा के लिए आसान नहीं होगा चायल विधानसभा सीट पर कमल खिलाना, जानें- सियासी समीकरण 

Kaushambi Political Equation of Chail Assembly seat: उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh)  के कौशांबी (Kaushambi) की चायल विधानसभा सीट (Chail Assembly seat) सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित है. ये सीट 2012 के पहले अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी. इसके बाद भी यहां सामान्य वर्ग के अलावा दलित एवं पिछड़े वर्ग के लोग विधायक बनने का दंभ भर रहे हैं. ऐसे में ये सीट इस दफा भाजपा (BJP) के खाते में आसानी से जाती नहीं दिख रही. क्योंकि, अभी से ही संभावित प्रत्याशी प्रचार प्रसार में जुटने लगे हैं. दलित बिरादरी के कई बड़े चेहरे भी अभी से ही मैदान में ताल ठोकने लगे हैं. इस सीट पर लगातार 3 बार बसपा (BSP) का कब्जा रहा है. बसपा से दयाराम पासी (Dayaram Pasi) लगातार 2 बार विधायक भी रह चुके हैं.

मोदी लहर का दिखा था असर 
चायल विधानसभा सीट वर्ष 2012 से सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित हो गई. ऐसे में यहां सामान्य बिरादरी के अलावा दलित एवं पिछड़ी जाति के लोगों ने चुनाव लड़ा लेकिन क्षेत्र की जनता ने सामान्य बिरादरी के लोगों पर ही भरोसा किया था. 2012 के विधानसभा चुनाव में सामान्य सीट से बसपा के आसिफ जाफरी चुनाव जीते थे. यानी बसपा के खाते में ये सीट लगातार 3 दफा गई थी. वर्ष 2017 के चुनाव में मोदी लहर के कारण भाजपा के संजय गुप्ता 85713 वोट पाकर विजई हुए थे. सपा-कांग्रेस के समर्थित उम्मीदवार तलत अजीम 45597 वोट पाकर दूसरे नम्बर पर रहे. तलत अजीम इस दफा भी कांग्रेस से दावा कर रहे हैं. आज तक सपा का यहां पर खाता भी नहीं खुला है. जबकि, बसपा वर्ष 2002 से 2012 तक अपनी सीट बचाने में कामयाब रही. लेकिन, 2017 के चुनाव में बसपा तीसरे पायदान पर खिसक कर चली गई.

सुर्खियों में है भाजपा से संजय गुप्ता और संतोष पटेल का नाम 
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा से वर्तमान विधायक संजय गुप्ता के अलावा संतोष पटेल का नाम भी सुर्खियों में है. क्योंकि, उनकी कुर्मी बिरादरी में अच्छी पकड़ है. उन्होंने वर्ष 2014 के उप चुनाव में भाजपा के टिकट पर सिराथू विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था. संतोष पटेल भाजपा काशी प्रांत के महामंत्री हैं, इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र के प्रभारी भी हैं. गिरीश पासी का भी चायल विधानसभा में नाम है. वो 2009 के लोकसभा चुनाव से बसपा के प्रत्याशी रहे हैं. इसके अलावा 2017 में निर्दल प्रत्याशी के रूप में उभर कर सामने आए, लेकिन हार का ही सामना करना पड़ा. गिरीश की पासी समाज में बढ़िया पकड़ है. नेवादा ब्लॉक में वो एवं उनकी पत्नी ब्लॉक प्रमुख भी रह चुके हैं. 2015 से 20 तक इनकी पत्नी शिखा सरोज जिला पंचायत सदस्य भी रह चुकी है. गिरीश के अलावा बसपा से ही अतुल द्विवेदी का भी नाम सामने आ रहा है. 

लोगों को होती है परेशानी 
चंद्रबली पटेल भी सपा के कद्दावर नेताओं में गिने जाते हैं. वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में बहुत ही कम मत से हारे थे. उनकी भी बिरादरी में अच्छी पकड़ है. जन अधिकार पार्टी के प्रदेश महासचिव लाखन सिंह राजपासी भी असरदार नेताओं में हैं. वो जिला पंचायत सदस्य भी रह चुके हैं, इसके अलावा पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने किस्मत आजमाई थी. चायल विधानसभा से सटे प्रयागराज के लगभग 22 गांव कौशांबी जिले के पिपरी थाने में लगते हैं, जिसके चलते नागरिकों को बेहद ही कठिनाई का सामना करना पड़ता है. राजस्व मामले के लिए प्रयागराज तो कानूनी कार्रवाई के लिए कौशांबी का चक्कर लगाना पड़ता है. पुलिस को फजीहतों का सामना करना पड़ता है.

निर्णायक भूमिका में हैं दलित वोटर 
वहीं, मौजूदा विधायक संजय कुमार गुप्ता के गृह नगर भरवारी में जाम की समस्या भी चुनावी मुद्दा बनती है. रेलवे फाटक के पास तो जाम लगा ही रहता है. लोगों को रोजगार मिले, इसके लिए बड़े उद्योगों की स्थापना की मांग हो रही है. चायल विधानसभा में अनुसूचित जाति के वोटरों की संख्या अधिक है. इनके बाद पिछड़ी जाति के वोटर हैं. यहां पर दोनों बिरादरी के लोगों पर नेताओं की नजर रहती है. लेकिन, निर्णायक भूमिका में सिर्फ दलित बिरादरी के वोटर ही रहते हैं. इसलिए चुनाव के दौरान विधानसभा में बड़े दलित नेताओं की भी जनसभा होती है. 

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